Prernadayak kahani
Viresh Rajput Viresh Rajput
12/2/2016 7:55:52 PM

इतिहास जो भुला दिया गया

भारत शेरों की तपोस्थली रहीहै यहाँ एक से बढ़कर एक वीरों ने जन्म लिया है | भारतीय रणबाकुरों ने वीरता केअदम्य साहस के ऐसे ऐसे उदाहरण पेश किये कि जिनको देखकर दुश्मनों ने दांतों तलेउगुलियाँ दबा ली।

ये कहानी है ऐसे ही एक वीर किजो अफगानी हमलावरों और उनके सैनिकों को अपने यहाँ नौकर बनाकर रखता था और हर अफगानीकेवल उस वीर के नाम से ऐसे थर थर कांपता था जैसे उसने नाम नही सुना हो बल्किसाक्षात् महा काल के दर्शन कर लिए हो. पर सबसे बड़ा अफ़सोस इस बात का है कि आजादी केबाद चाटुकार वामपंथियों और कांग्रेस ने मिलकर इस देश से महान हिन्दू योद्धाओं काइतिहास मिटा के रख दिया ताकि हिन्दुओं को कभी सच्चाई पता ना चल सके और उनको अपनेभूतकाल और इतिहास पर कभी गौरव का अनुभव ना हो . हमारे इतिहास में सभी विदेशीमुस्लिम शासकों का तो नाम है, यहाँ तक की अंग्रेजी राजा-रानियोंका भी अता-पता है लेकिन इस महान और वीर योद्धा का नाम कहीं नहीं मौजूद है. आज हमबात करेंगे ऐसे ही एक योद्धा की जिनका नाम है सरदार हरि सिंह नलवा (1791-1837).

कौन हैंहरि सिंह नलवा

हरिसिंह नलवा महाराजा रणजीतसिंह के सेनापति थे उनका जन्म १७९१ में २८ अप्रैल को एक सिख परिवार, गूजरवाला- पंजाब में हुआ था इनके पिता का नाम गुरदयाल सिंहमाँ का नाम धर्मा कौर था, बचपन में उन्हें घर पर लोगहरिया के नाम से पुकारते थे सात वर्ष में ही पितृ-क्षाया उनके ऊपर से उठ गयी १८०५में महाराजा रणजीत सिंह ने बसंत उत्सव पर प्रतिभा खोज प्रतियोगिता का आयोजन कियाजिसमे भाला, तलवार, धनुष-बाण इत्यादि शस्त्र चलाने में नलवा ने अद्भुत प्रदर्शनकिया महाराजा बहुत प्रभावित हो अपनी सेना में भारती कर अपने साथ रख लिया.

एक दिन महाराजा शिकार खेलनेगए अचानक रणजीत सिंह के ऊपर शेर ने हमला बोल दिया हरीसिंह ने उसे वही तमाम कर दियारणजीत सिंह के मुख से अचानक ही नक़ल गया अरे तुम तो राजा नल जैसे वीर हो तब से उनकेनाम में नलवा जुड़ गया और वे सरदार हरिसिंह नलवा sardar Hari Singh Nalwa कहलाने लगे,

महाराजा के अत्यंत विस्वासपात्र बन गए उनको कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया वहा की स्थित देखकर वे बिहवलहो गए, उनके अन्दर गुरु गोविन्द सिंह का संस्कार और बंदा का रक्तथा वे जीते -जागते बंदा बैरागी के सामान गुरु के शिष्य थे वे पहले हिन्दू महापुरुषथे जो वास्तविक बदला लेना जानते थे और ''सठे साठ्यम समांचरेत'' जैसा ब्यवहार करते थे यदि उनका अनुशरण हमारे हिन्दू वीरकरते तो भारत की ये दुर्दसा नहीं होती कश्मीर घाटी में पहुचते ही वे जिन मंदिरोंको ढहाकर मस्जिद बनाया गया था उसे वे चाहते थे की उसी स्थान पर मंदिरों का निर्माणकिया जाय जिन मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ दिया गया था, मुसलमानों से कर लिया जाय, उन्होंने जिस प्रकार मुस्लिम शासको ने हिन्दुओ के साथब्यवहार किया था उन मुसलमानों के साथ वैसा ही ब्यवहार करते थे उन्होंने बिधर्मीहुए बंधुओ की घर वापसी भी की जिससे बिना किसी संकोच के बड़ी संख्या में लोगो की घरवापसी होण लगने लगी, लेकिन कही न कही हिन्दुओ कीउदारता आड़े आयी और कश्मीरी पंडितो ने उन्हें ऐसा करने से उन्हें रोका मस्जिदों कोनहीं गिराया जाय आज उसका परिणाम कश्मीरी पंडित झेल रहे है।

           नलवा कश्मीर को जीतते हुए अफगानिस्तानभी पंहुचा वहा पर हिन्दुओ पर जजिया कर लगा था नलवा ने कर तो हटा ही दिया बदलेमुसलमानों से कर वसूलना शुरू किया वे मुस्लिम औरतो की इज्जत तो करते थे लेकिन यदिकोई मुस्लिम हिन्दुओ की औरतो को ले जाता तो वे उसके साथ वैसा ही करते वे सच्चेहिन्दू शासक थे जो हिन्दुओ के दुःख को समझते थे वे मुसलमानों से कैसा ब्यवहार करनाजानते थे वे ही एक ऐसे शासक थे जिन्होंने मस्जिदों के बदले मंदिरों की सुरक्षा की, यदि किसी ने मंदिर तोड़े तो उतनी ही मस्जिद तोड़कर उसका जबाबनलवा देता था, अहमद्साह अब्दाली और तैमुरलंगके समय भी बिस्तृत और अखंडित था इसमें कश्मीर, पेशावर, मुल्तान और कंधार भी था, हैरत, कलात, बलूचिस्तान और फारस आदि परतैमुरलंग का प्रभुत्व था हरीसिंह नलवा ने इनमे से अनेक प्रदेश राजा रणजीत सिंह केराज्य सीमा के विजय अभियान में सामिल कर दिया मुल्तान विजय में उनकी महत्वपूर्णभूमिका थी महाराजा के आवाहन पर आत्मबलिदानी दस्ते में सबसे आगे थे, इस संघर्ष में उनके कई साथी बलिदान हुए लेकिन मुल्तान काकिला १८२४ में महाराजा रणजीत सिंह के हाथो में आ गया, 30 अप्रेल 1837 में जामरोद पर अफगानों ने आक्रमण किया रंजितसिंह के बेटे का विबाह लाहौर में था हरि सिंह पेशावर में वीमार थे आक्रमण की  सुनते ही वे जामरोद पहुचे हरी सिंह का नाम सुनतेही अफगानी सैनिक पराजित हो भाग निकले नलवा और सरदार निधन सिंह उनका पीछा कारने लगेरस्ते में सरदार सम्सखान एक घाटी में छिपा हुआ था घाटी में पहुँचते ही नलवा परआक्रमण हुआ धोखे से नलवा पर पीछे से गोली मार दी इसके बाद भी हरी सिंह दौडाते रहेजब वे जामरोद पहुचे तो उनका निष्प्राण शरीर ही घोड़े पर था ३० अप्रैल १८३७ को उसहुतात्मा की अंत्येष्ठी की गयी।

हरि सिंह का भय था ऐसा कि मौलवी नमाज छोड़कर भागजाते थे

कई इतिहासकार यह भी लिखते हैं कि सरदार हरि सिंहनलवा का लोगों में काफी खौफ था. घर-घर में नलवा जी के ही किस्से चला करते थे. ऐसाबोला जाता है कि कई बार जब सरदार नलवा जी के आने की खबर होती थी तो मौलवी नमाजपढ़वाना तक छोड़कर भाग जाते थे. इनका नाम सुनते ही मुस्लिम सेनापतियों की तलवार हाथसे ही छुट जाती थी.

आज भी अफगानिस्तान की महिलायेनलवा के नाम से अपने बच्चो को डराती है, (सो जा बेटे नहीं तो नलवा आजायेगा) नलवा एक महान योधा भारतीय सीमा का विस्तार करने वाले गुरु गोविन्द सिंह केअसली उत्तराधिकारी थे, उन्हें तो लोग गुरुगोविन्दजैसा ही स्वीकार करते थे,

क्यों आज सरदारों के बारे मेंबारह बजे कहकर मजाक उड़ाते हैं ?

अगर आपको इसकी हकीकत का पताचलेगा तो आप शर्म से अपना सर झुका लेंगे आखिर क्या है १२ बजे पागल होने का राज. सरदारहरी सिंह नलवा जी जो की १२ बजे रात अथवा दिन को हमला करते थे, एक भूके शेर की तरहटूट पड़ते थे . दुश्मनों को ऐसा लगता था कि जैसे कोई देवदूत हमला कर रहा हो इस नातेआज सरदारों के बारे में बारह बजे कहकरमजाक उड़ाते हैं उन्हें पता नहीं कि हरिसिंह बारह बजे ही पागल हो हमला करताथा यह उनके लिए सफलता का द्योतक था, बहुत से बिचारक तो यहाँ तकमानते है कि नलवा के शरीर में सेनानी पुष्यमित्र की आत्मा थी, जिस प्रकार वैदिक धर्म की रक्षा में पुष्यमित्र ने उस कालकी दिशा को मोड़ दिया था उसी प्रकार वीर सेनानी हरीसिंह नलवा ने अपने समय में कालको ही अपने हाथ में ले लिया था वह महान देश भक्त, सीमा रक्षक और धर्म रक्षक थे, वे किसी के बिरोधी नहीं थे बल्कि उनके अन्दर हिन्दूस्वाभिमान था,

कुछ विद्वानों का मानना है किराजा हरि सिंह नलवा की वीरता को, उनके अदम्य साहस को पुरस्कृतकरते हुए भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की तीसरी पट्टी को हरा रंग दिया गया है।हालांकि इस बात का कोई भी स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

सिक्खों के सर्वाधिक लोकप्रियसरदारों की गिनती में शुमार सरदार हरिसिंह नलवा ने  सियालकोट (1802), कसूर (1807), मुल्तान (1818), कश्मीर (1819), पखली  और दमतौर (1821-2), पेशावर (1834) और ख़ैबर हिल्स में जमरौद (1836) पर विजयप्राप्त कर सिक्ख साम्राज्य का विस्तार किया।

ऐसे हिन्दू हृदय सम्राट वीरसेनापति नलवा को कोटि -कोटि नमन।

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